(1) मरीचि के पुत्र कश्यप प्रजापति थे। ब्रह्मदेव की दाहिनी हाथ की बोटे की नली से दक्ष नाम का पुरुष और बाएँ हाथ की बोटे की नली से धरनी नाम की स्त्री जन्मीं। उन दोनों से एक हज़ार-हज़ार महा ऋषि जन्मे। (2) ब्रह्मा के मानस पुत्रों में दूसरे स्थान पर रहने वाले अंगिरस्‍ु को उद्दध्य, बृहस्पति और संवर्त जैसे पुत्र हुए। बृहस्पति देवताओं के आचार्य बने। (3) मैत्रि (अत्रि) नामक मानस पुत्र से अनेक महा मुनि जन्मे। (4) पुलस्त्य नामक ब्रह्मा के मानस पुत्र से राक्षसों का जन्म हुआ। (5) पुलह नामक मानस पुत्र से किन्नर और किमपुरुष वर्ग उत्पन्न हुए। (6) क्रतू नामक मानस पुत्र से पक्षियों की जाति उत्पन्न हुई।

   
    

महाभारत का अरयण्क पर्व – Mahabharat Aranyak Parv in Hindi


॥ श्रीः ॥
3.267. अध्यायः 267
Mahabharata - Vana Parva - Chapter Topics
कोटिकाश्यप्रति द्रौपद्या जननादिस्वीयवृत्तान्तकथनम् ॥ 1 ॥
Mahabharata - Vana Parva - Chapter Text

वैशम्पायन उवाच। 3-267-0x(2655)(26171)
अथाब्रवीद्द्रौपदी राजपुत्री
पृष्टा शिबीनां कप्रवरेण तेन।
अवेक्ष्य मन्दं प्रविमुच्य शाखां
संगृह्णती कौशिकमुत्तरीयम् ॥ 3-267-1(26172)
बुद्ध्याऽभिजानामि नरेनद्रपुत्र
न मादृशी त्वामभिभाष्टुमर्हति।
न त्वेह वक्ताऽस्ति तवेह वाक्य-
मन्यो नरो वाऽप्यथवाऽपि नारी ॥ 3-267-2(26173)
एका ह्यहं संप्रति तेन वाचं
ददानि वै भद्र निबोध चेदम्।
अहं ह्यरण्येकथमेकमेका
त्वामालपेयं निरता स्वधर्मे ॥ 3-267-3(26174)
जानामि च त्वां सुरथस्य पुत्रं
यं कोटिकाश्येति विदुर्मनुष्याः।
तस्मादहं शैब्य तथैव तुभ्य-
माख्यामि बन्धून्प्रथितं कुलं च ॥ 3-267-4(26175)
अपत्यमस्मि द्रुपदस्य राज्ञः
कृष्णेति मां शैब्य विदुर्मनुष्याः।
साऽहं वृणे पञ्च जनान्पतित्वे
ये खाण्डवप्रस्थगताः श्रुतास्ते ॥ 3-267-5(26176)
युधिष्ठिरो भीमसेनार्जुनौ च
माद्र्याश्च पुत्रौ पुरुषप्रवीरौ।
ते मां निवेश्यह दिशश्चतस्रो
विबज्य पार्था मृगयां प्रयाताः ॥ 3-267-6(26177)
प्राचीं राजा दक्षिणां भीमसेनो
जयः प्रतीचीं यमजावुदीचीम्।
मन्ये तु तेषां रथसत्तमानां
कालो बहुः प्राप्ता इहोपयातुम् ॥ 3-267-7(26178)
संमानिता यास्यथ तैर्यथेष्टं
विमुच्य वाहानवरोहयध्वम्।
प्रियातिथिर्धर्मसुतो महात्मा
प्रीतो भविष्यत्यभिवीक्ष्य युप्मान् ॥ 3-267-8(26179)
एतावदुक्त्वा द्रुपदात्मजा सा
शैव्यात्मजं चन्द्रसुखी प्रतीता।
विवेश तां पर्णशालां प्रशस्तां
संचिन्त्य तेषामतिथिस्वधर्मम् ॥ 3-267-9(26180)

इति श्रीमन्महाभारते अरण्यपर्वणि द्रौपदीहरणपर्वणि सप्तषष्ट्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ 267 ॥

Mahabharata - Vana Parva - Chapter Footnotes
3-267-2 अभिभाष्टुं अभिभाषितुम्। त्वामपि द्रष्टुमर्हेति ध. पाठः ॥ 3-267-3 तेन कारणेन ॥ 3-267-7 जयोऽर्जुनः ॥


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